भारत की आजादी की घोषणा के साथ ही द्विराष्ट्र का सिद्धांत सामने आया (बल्कि लाया गया) जिसके मूल में एक अलग देश की सत्ता पाने की लिप्सा काम कर रही थी और उसके प्रतीक थे जिन्ना। यह उन्हीं की भूख थी जिसने भारत-विभाजन की पटकथा लिखी। भारत-विभाजन, जिसे आज दुनिया की सबसे बड़ी विभिषिकाओं में शुमार किया जाता है। मानवता और सामूहिकता के सिद्धांत की इससे निर्मम हत्या भला क्या हो सकती थी। पर आज जब ऐसी विभीषिका के परिप्रेक्ष्य में गांधी के बरक्स जिन्ना की तस्वीर पर बहस शुरू हो जाती है तो सचमुच सावधान होने की जरूरत है। गांधी के देश में जिन्ना का नायकत्व गढ़ने की नापाक कोशिश पर ‘जनसत्ता’ के ‘बेबाक बोल’ कॉलम में मुकेश भारद्वाज का बड़ा ही सारगर्भित आलेख ‘तारीखी तस्वीर’ शीर्षक से छपा है।

अपने इस आलेख में वे लिखते हैं, भारत में जब स्वतंत्रता सेनानियों को आजादी के जश्न में डूब जाना चाहिए था तब आजादी के हरकारों का अगुआ नोआखली में घूम रहा था। एक दुबला-पतला, कम हाड़ और कम मांस का आदमी जिसके बारे में वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि आगे आने वाली पीढ़ियां शायद ही विश्वास कर सकेंगी कि कभी धरती पर ऐसा व्यक्ति चला भी होगा। वह बूढ़ा इंसान जिसे संत और महात्मा का दर्जा दिया जा चुका था, बिना सुरक्षा के वहां था जहां आजादी के एलान के बाद कत्लेआम मचा था। नोआखली जनसंहार भारत के इतिहास का वह पन्ना है जो उसकी आजादी के साथ ही नत्थी हो जाता है। दो सौ सालों की औपनिवेशिक गुलामी के बाद आजादी मिलने का वक्त आते ही भारत के सामने मांग उठी भारत को दो टुकड़ों में बांटने की, वह भी सिर्फ मजहब के आधार पर। आजादी और विभाजन का साथ आना इस ऐतिहासिक संघर्ष की ऐतिहासिक विडंबना ही थी। जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन प्लान पूर्वी बंगाल के नोआखली में शुरू कर दिया गया। गांधी की अहिंसा की प्रयोगशाला था भारत। प्रयोग सफल था, आजादी मिल चुकी थी। लेकिन इस प्रयोगशाला के कुछ परखनलियों में मजहबी सांप्रदायीकरण के रसायनों का विस्फोट किया जा चुका था। भारत की आजादी और अखंडता के बूढ़े सिपाही गांधी वहां अकेले पहुंचे। कत्लेआम और आग के बीच यह महानायक निहत्थे खड़ा रहा पीड़ितों के साथ। महात्मा गांधी के उस फौलादी जज्बे को देख कर ही सोचा गया होगा कि इस निर्भीक के सीने में गोलियां उसके पांव छूकर ही उतारी जा सकती हैं। पांच महीने नोआखली में रहने और वहां के प्रशासन से शांति का भरोसा लेकर ही गांधी वहां से हटे।

गांधी की यह तस्वीर है अहिंसा और मजहबी एका की। क्या भारत के किसी भी सार्वजनिक संस्थान में यह पहली तस्वीर नहीं होनी चाहिए। जब भारत के पास ऐसे विश्वास और भरोसे की तस्वीर है तो फिर जिन्ना की तस्वीर की जरूरत क्यों पड़ जाती है। आखिर उस वक्त जिन्ना को बहस में क्यों ले आया जाता है जब कौमी एकता की ज्यादा जरूरत है। अगर जिन्ना की तस्वीर पर सवाल नाजायज है तो जिन्ना की विचारधारा को जायज ठहराने की कोशिशों को क्या कहा जाए।

भारत में शरण लिए बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने जिन्ना विवाद के बाद ट्वीट किया, “अगर आप द्विराष्ट्र सिद्धांत पर भरोसा करते हैं तो जरूर आप जिन्ना विवाद को पसंद करेंगे। बांग्लादेश मुक्ति संग्राम ने 1971 में सिद्ध कर दिया कि यह द्विराष्ट्र का सिद्धांत गलत था, और मुसलिम एकता एक भ्रम।” बीच बहस में तस्लीमा का यह ट्वीट ही बहुत कुछ कह जाता है। अगर मुसलिम एकता ही सब कुछ थी तो फिर बांग्लादेश का निर्माण कैसे हुआ। अंग्रेजों के खिलाफ एशिया का विशाल भूभाग जंग लड़ता है। लेकिन जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत की वजह से यह भूभाग भारत और पाकिस्तान नें बंट जाता है। इसके लिए हिन्दू महासभा की भी जिम्मेदारी तय हो चुकी है लेकिन इस प्रस्तावित पाकिस्तान का शासक बनने के लिए जो आदमी खड़ा था उसकी महत्वाकांक्षा के बिना यह हो ही नहीं सकता था। और, मुख्य बहस में तो हम सिर्फ भारत और पाकिस्तान को ही लाते हैं, वहीं तस्लीमा नसरीन कहती हैं कि हमें मत भुलाओ, दो राष्ट्र के सिद्धांत में हम बांग्लादेशी कहां से आ गए यह तो बताओ। आजादी के बाद जब भारत को एशिया की सबसे बड़ी ताकत बनना था तो तीन टुकड़ों में बांटकर उसे छिन्न-भिन्न कर दिया गया।

इतिहास से लेकर वर्तमान में प्रतीकों और तस्वीरों का अपना महत्व है। विवाद उठने के बाद भी अगर आप नोआखली वाले गांधी के बरक्स जिन्ना की तस्वीर टांगने की जिद मचाए रखते हैं तो अपना ही नुकसान करते हैं। देश के कमजोर तबकों के मुसलमानों से बात कर लीजिए। आज के दौर में वे जिन्ना के बारे में नहीं गांधी के बारे में ही जानते हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों में जिन्ना के महिमामंडन के जो व्याख्यान शुरू हो चुके हैं वह हमें किस तरफ ले जाएंगे।

विभाजन के बाद भारत ने क्या खोया और पाकिस्तान ने क्या पाया इस पर उर्दू की मकबूल अफसानानिगार कुर्रुतुल ऐन हैदर की ‘आग का दरिया’ से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। निदा फाजली ने इस किताब के बारे में कहा है, “मोहम्मद अली जिन्ना ने हिन्दुस्तान के साढ़े चार हजार सालों की तारीख में से मुसलमानों के 1200 सालों को अलग कर पाकिस्तान बनाया था। कुर्रुतुल ऐन हैदर ने आग का दरिया लिख उन 1200 सालों को हिन्दुस्तान में जोड़ कर उसे फिर से एक कर दिया।” जिन्ना ने हिन्दुस्तान के सिर्फ 1200 सालों को चुना एक नया मुल्क बनाने के लिए। लेकिन क्या बिना राम, कृष्ण और बुद्ध की सांस्कृतिक विरासत लिए निजामुद्दीन औलिया का सूफियाना कलाम कोई रूहानी सुकून दे पाता? आजादी को करीब देख कर द्विराष्ट्र का जो सिद्धांत लाया गया वह सत्ता हथियाने का औजार ही था। आप इसमें सावरकर और हिन्दूवादी संगठनों को ला सकते हैं लेकिन इसके प्रतीक जिन्ना ही बने एक नए देश पाकिस्तान के प्रमुख के रूप में। सत्ता की उनकी इस महत्वाकांक्षा और संकीर्ण मजहबी दृष्टिकोण के कारण ही बांग्लादेश का जन्म हुआ। भारत में जो 1200 सालों का इतिहास था, पाकिस्तान में वह और संकीर्ण हो जाता है भाषा और जाति को लेकर। और, इसी संकीर्णता के प्रतीक के रूप में जिन्ना न भारत के नायक बन सकते हैं और न बांग्लादेश के।

गांधी की राजनैतिक लड़ाई सत्ता हथियाने की नहीं बल्कि इंसानों के बीच भेदभाव के खिलाफ थी। मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने ईसा मसीह के प्रेम के संदेशों के सफल प्रयोगकर्ता के रूप में गांधी को देखा था। प्रेम की नीति व्यक्तिगत ही नहीं सामाजिक और राजनीतिक रिश्तों में भी प्रभावी होती है। किंग जूनियर को यह समझ गांधी से ही मिली थी। गांधी की तस्वीर घृणा के प्रतिरोध की तस्वीर है। गांधी के इस दिश में जिन्ना की तस्वीर पर तकरार कर हम महज 1200 सालों तक खुद को सीमित रख लेंगे। भारत के पास उससे पहले, मध्य और बाद का साझा इतिहास है। तारीखो में तारीखी वही होता है जो मानवता की राह पर चलता है, खलनायकों का कोना जड़ ही रहने देना चाहिए, उनके लिए जीवंत समाज में जगह नहीं होनी चाहिए। अपने इस महत्वपूर्ण आलेख के लिए मुकेश भारद्वाज सचमुच साधुवाद के पात्र हैं।


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